PHALGU TIRTH
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धरती को प्राचीन काल में 7 द्वीपों में बांटा गया था - जम्बू द्वीप , प्लक्ष द्वीप , शाल्मली द्वीप , कुश द्वीप , क्रौंच द्वीप , शाक द्वीप एवं पुष्कर द्वीप। इसमें से जम्बू द्वीप सभी के बीचो बीच स्थित है।जम्बू द्वीप के 9 खंड थे - इलावृत , भद्राश्व , किंपुरुष , भारत , हरिवर्ष , केतुमाल , रम्यक , कुरु और हिरण्यमय। संसार के जिन स्थानों पर सबसे पहले मानव सभ्यता का विकास हुआ , उनमें कुरू क्षेत्र का नाम अग्रगण्य है। सरस्वती एवं दृषद्वती जैसी पवित्र नदियों की इस धरा पर वैदिक सभ्यता का उद्भव हुआ। भारतीय धर्म , दर्शन , कला , साहित्य आदि के विकास में प्रथम सृजन यहीं हुआ। कृष्ण यजुर्वेद की मैत्रायणी शाखा में कुरूक्षेत्र का स्पष्ट उल्लेख मिलता है। ऋग्वेद से प्राप्त जानकारी के अनुसार आर्यों की प्रमुख जातियां भरत एवं पुरू भी इसी पावन धरा से जुड़े रही हैं। जिनके सम्मिश्रण से कुरू नामक जाति का आविर्भाव हुआ। इसलिए ही इसे कुरूक्षेत्र कहा गया है। कुरूक्षेत्र यानि कुरूओं का क्षेत्र । वामन पुराण के अनुसार सरस्वती और दृषद्वती नदियां इस पवित्र धरा से होकर बही हैं। दृषद्वती नदी सरस्वती के साथ - साथ वही नदी है जिसने कुरूक्षेत्र धरा को गरिमा प्रदान की है। इस नदी का प्रवाह मार्ग कौल ( कैथल ) से होते हुए फल्कीवन ( फरल ) रहा है। हालांकि वर्तमान समय में दृषद्वती के बहने के मार्ग के अवशेष मात्र शेष है। जो फरल गांव पूर्व दिशा में स्थित हैं।
                     48 कोस कुरू भूमि हरियाणा के कुरूक्षेत्र , कैथल , करनाल , जीन्द एवं पानीपत जिलों में फैली हुई है। महाभारतानुसार उत्तर - पूर्व में रंतुक यक्ष ( बीड़ पीपली के पास ) पश्चिम में अरंतुक यक्ष ( कैथल में बेहर गांव के पास ) दक्षिण - पश्चिम में रामहृद यक्ष ( जिला जीन्द में रामराय के पास ) एवं दक्षिण पूर्व में मचक्रुक यक्ष ( जिला पानीपत में शींख के पास ) का स्पष्ट वर्णन मिलता है। इस प्रकार इन चार यक्षों द्वारा रक्षित इस आयताकार 48 कोस की भूमि में 360 तीर्थों की उपस्थिति मानी जाती है। कुरूक्षेत्र की पवित्र भूमि प्राचीन काल में घने वनों से आच्छादित थी। वामन पुराण में कुरूक्षेत्र भूमि में स्थित सात वनों का स्पष्ट नामोल्लेख मिलता है। जैसे - काम्यक वन , अदिति वन , व्यास वन , फलकीवन , सूर्यवन वन , मधुवन तथा शीतवन वामन पुराण के अनुसार इन पुण्यशाली वनों के नाम का उच्चारण करते ही मनुष्य के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं :-

                   श्रृणु सप्त वनानीह कुरूक्षेत्रस्य मध्यतः।


                   येषां नामानि पुण्यानि सर्वपापहराणि च।


                   काम्यकं वनं पुण्यं दितिवनं महत्।


                   व्यासस्य वनं पुण्यं फलकीवनमेव


                   तथा सूर्यवनस्थानं तथा मधुवनं महत्।


                   पुण्यं शीतवनं नाम सर्वकल्मषनाशनम्


                                                 ( वामन पुराण -34/3-5)

                                                             सात वनों में प्रसिद्ध फलकीवन में ही फल्गु तीर्थ सुशोभित है। हरियाणा प्रदेश के कैथल जिले के गांव फरल में स्थित यह तीर्थस्थान कैथल से 25 कि 0 मी 0 कुरूक्षेत्र से 27 कि 0 मी 0 और पेहवा से 20 कि 0 मी 0 ढाण्ड - पूण्डरी मार्ग पर लगभग दोनों के मध्य स्थित है। फल्गु तीर्थ के कारण ही गांव का नाम भी फरल पड़ा। इस तीर्थ का वर्णन महाभारत , वामन पुराण मत्स्य पुराण तथा नारद पुराण में उपलब्ध होता है। महाभारत एवं पौराणिक काल में इस तीर्थ का महत्व अपने चरम उत्कर्ष पर था।महाभारत एवं वामन पुराण दोनों में यह तीर्थ देवताओं की तपस्या की विशेष स्थली के रूप मं उल्लिखित है। महाभारत वन पर्व में तीर्थ यात्रा प्रसंग के अन्तर्गत इस तीर्थ के महत्व के विषय में स्पष्ट उल्लेख है :

                        ततो गच्छेत राजेन्द्र फलकीवनमुत्तमम्।


                     तत्र देवाः सदा राजन् फलकीवनमाश्रिताः।


                     तपश्चरन्ति विपुल बहुवर्षसहस्रकम्।


                                                ( महाभारत , वन पर्व 83,85,86)


अर्थात तत्तपश्चात् मनुष्य को देवों द्वारा देवताओं ने हजारों वर्षो तक कठोर तपस्या की। बिल्कुल ऐसा ही वाक्य वामन पुराण में भी उपलब्ध होता है , जहां लिखा है कि तत्पश्चात देवता , गन्धर्व , साध्य एवं ऋषि लोगों को दिब्य निवास वाले उस फलकीवन में जाना चाहिए जहां देव , गन्धर्व , सिद्ध एवं ऋषि सदैव तपस्यारत रहते है।


             महाभारत के अनुसार इस तीर्थ में स्नान करने एवं देवताओं का तर्पण करने से मनुष्य अग्निष्टोम तथा अतिरात्र यज्ञों के करने से कहीं अधिक श्रेष्ठतर फल को प्राप्त करता है। वामन पुराण में भी लिखा है कि इस तीर्थ में स्नान करने से तथा देवताओं का तर्पण करने से मनुष्य अग्निष्टोम तथा अतिरात्र यज्ञों से भी अधिक फल प्राप्त करता है। वामन पुराण के 36 में अध्याय के श्लोक संख्या 49 और 50 में वर्णित है :-


              ‘‘ सोमक्षये सम्प्राप्ते सोमस्य दिन तथा।


                     यः श्राद्ध मत्यस्तस्य फल पुष्पम्। 49


              ‘‘ गंगायां यथा श्राद्ध पितृन्प्रीणति नित्यशः।


                तथा श्राद्ध कर्तव्य फल्कीवनमाश्रितैः। 50


                          अर्थात ‘‘ अमावस्या ( सोमक्षय ) होने पर सोमवार के दिन जो मनुष्य श्राद्ध करता है , उसे बहुत अधिक पुण्य प्राप्त होता है।। 49 ।। फल्कीवन में फल्गु तीर्थ पर किया गया श्राद्ध पितरों को वैसा ही तृप्त और सन्तुष्ट करता है जैसा कि गया जी में किया हुआ श्राद्ध नित्य ही पितृगण ( पितरों ) को प्रसन्न करता है।। 50 ।।


            लाखों श्रद्वालु इस योग के प्राप्त होने पर यहां पितरों के निमित श्राद्ध करते हैं -


            ‘‘ फल्गुतीर्थे विष्णुजले करोमि स्नानमद्य वै।


             पितृणां विष्णुलोकाय भुक्तिमुक्तिप्रसिद्धये।। ’’


                 अग्नि पुराण में भी फल्गु नामक एक तीर्थ का वर्णन है जिसका जल एवं भूमि लक्ष्मी तथा काम धेनू के फल देने वाले है। इस तीर्थ का उल्लेख वायु पुराण में भी विस्तार से वर्णन किया है तथा इसे सर्वश्रेष्ठ तीर्थ की संज्ञा दी गई है :


                   फल्गुतीर्थ व्रजेतस्मात्सर्वतीर्थोत्तमोत्तमम्।


                   मुक्तिर्भवति कर्तृणां पितृणां श्राद्धतः सदा।।


                   ब्राह्मणा प्राथितो विष्णुः फल्गुको हय्भवत्पुरा।


                  दक्षिणाग्नौ हुतं तत्र तद्रजः फल्गुतीर्थकम्।


                                अर्थात् तदनन्तर सभी तीर्थो में श्रेष्ठ फल्गुतीर्थ की यात्रा करनी चाहिए ; वहां पर श्राद्ध करने वालों की एवं उनके पितरों की सर्वदा मक्ति होती है। वहां पर ब्रह्मा की प्रार्थना पर प्राचीन काल में भगवान विष्णु स्वयं फल्गु रूप में प्रतिष्ठित हुए थे। इसी पुराण में इस तीर्थ के माहात्मय में विस्तार से लिखा है कि यज्ञ की दक्षिणाग्नि में आहुति रूप में पड़ा हुआ रज फल्गुतीर्थ के रूप में प्रसिद्ध हुआ।


                                    फल्गु तीर्थ के माहात्म्य एवं सर्वश्रेष्ठ होने की पुष्टि इसी तथ्य से हो जाती है कि सम्पूर्ण पृथ्वी के समस्त तीर्थ समूह देवताओं के साथ इस फल्गु तीर्थ में स्नान के लिए आते हैं :-


                   तीर्थानि यानि सर्वाणि भुवनेष्वखिलष्वपि।


                   तानी स्नातुं समायान्ति फल्गुतीर्थ सुरैः सह।।


                                                                   ( वायु -111/15)


 


 


वायु पुराण में फल्गु तीर्थ को पतित - पावनी गंगा से भी श्रेष्ठ मानते हुए कहा गया है -


                 गंगा पादोदकं विष्णोः फल्गुहृदि गदाधरः।


                 स्वयं हि द्रवरूपेण तस्माद् गंगाधिकं विदुः।।


                                                                 ( वायु -111/16)


                        अर्थात् गंगा भगवान विष्णु की पादोदक स्वरूप है किन्तु फल्गु तो स्वयं आदि गदाधर स्वरूप हैं ; इस प्रकार उनका महात्म्य गंगा से अधिक माना गया है। इस तीर्थ के माहात्म्य विस्तार में आगे लिखा है कि जो व्यक्ति एक लाख अवश्वमेध यज्ञ करता है। वह भी इतना ही फल  


                                    नहीं प्राप्त करता जितना फल मनुष्य फल्गु तीर्थ में स्नान कर लेने से प्राप्त कर लेता है। फल्गु तीर्थ में स्नान कर मनुष्य को तर्पण एवं पिण्ड श्राद्ध कर्म अपने गृह्यसूक्त के अनुसार करना चाहिए। फल्गु तीर्थ में स्नान कर आदि गदाधर देव दर्शन करने पर मनुष्य को निम्नोक्त फल प्राप्त होता है :-


                     फल्गुतीर्थे नरः स्नात्वा दृष्ट्वा देवं गदाधरम्।


                     आत्मान तारयेत्सद्यो दश पूर्वान्दशापरान्।।


अर्थात् फल्गु तीर्थ में स्नान करके गदाधर देव का दर्शन करने वाला मनुष्य अपने उद्धार के साथ - साथ अपने पूर्व की दस पीढि़यों तथा भावी दस पीढि़यों का उद्धार करता है। इस तीर्थ के विस्तारक्षेत्र के विषय में आगे लिखा है :-


               नागकूटाद् गृध्राकूटाद्यूपादुन्तरमानसात्।


               एतद्गयाशिरः प्रोक्तं फल्गुतीर्थ तदूच्यते।


अर्थात नागकूट से गृध््राकूट , गृध््राकूट से यूप से उत्तर मानसः ये ही गयासुर के शिरोभग कहे जाते हैं। इन्ही को फल्गुतीर्थ कहते हैं। अतः इस तीर्थ में आदि गदाधर देव को श्रद्धापूर्वक मंत्र से नमस्कार करना चाहिए। जो व्यक्ति पंचामृत द्वारा उन्हें स्नान करवाकर , सुन्दर पृष्प एवं वस्त्रादि से अलंकृत कर भगवान गदाधर की पूजा करता है ; उसकी सारी श्राद्ध क्रिया सफल होता है तथा इसके विपरीत करने वाले की सम्पूर्ण श्राद्ध क्रिया निष्फल हो जाती है।


                          अब अगर फलकीवन ( कैथल ) स्थित फल्गु तीर्थ के बारे बात करें तो सर्वप्रथम जिस बात का उल्लेख आवश्यक है वह श्री फल्गु ऋषि का जिक्र है। आखिर उनके तप का ही प्रभाव है कि आज यह क्षेत्र प्रसिद्ध है। उनके नाम से ही यह वन फल्कीवन हुआ।


            ऋषिवर इस वन में तपस्या करते थे। पुराणानुसार एवं लोककिवंदंतियों में कहा जाता है कि उनके तपस्या काल में प्रसिद्ध गया जी तीर्थ बिहार पर गयासुर का राज्य था। गयासुर की यह प्रतिज्ञा थी कि जो उसे युद्ध में पराजित कर देगा उसके साथ वह अपनी तीनों पुत्रियों का विवाह करेगा। उस समय फल्गु तीर्थ यानी फलकी वन में फल्गु ऋषि तपस्य कर रहे थे।


            गयासुर से त्रस्त लोगों और देवताओं के अनुरोध से जब उन्हें गयासुर की प्रतिज्ञा का पता चला तो गृहस्थ आश्रम को सर्वश्रेष्ट समझकर वहां गए और शास्त्रार्थ में गयासुर को पराजित करके उसकी तीनों कन्याओं के साथ विवाह कर लिया एवं गृहस्थी बनें। दहेज में गयासुर ने गया जी में पितृतृप्ति हेतु किए जाने वाले कार्यो में मिलने वाले फल का वर भी दिया।


                                       इस पावन तीर्थ पर फल्गु ऋषि के मन्दिर के अलावा इस प्रसिद्ध तीर्थ पर कई सुन्दर मन्दिर हैं। यहां सरोवर के घाट के पास अष्टकोण आधार पर निर्मित 17 वीं शताब्दी की मुगल शैली में बना शिव मन्दिर है जो लगभग 30 फुट ऊंचा है। यहां स्थित सरोवर की लम्बाई 800 फुट और चैडाई 300 फुट है। मुगल शैली में एक और शिव मन्दिर है जो लगभग 20 फुट ऊंचा है तथा आकार में वर्गाकार है। वर्ग की एक भुजा 9 फुट 6 इंच है। यहीं एक अन्य मन्दिर जो राधा - कृष्ण का भी है जो नागर शैली में बना हुआ है। जिसका शिखर शंकु आकार का है। इन सभी उपरोक्त वर्णित मन्दिरों में निर्माण के दौरान लाखौरी ईटों से किया गया है एवं परवर्ती काल में इनका जीर्णोद्धार आधुनिक ईटों के द्वारा किया गया है। घाट के पास ही एक अत्यन्त प्राचीन वट वृक्ष है। जिसे लोग श्रद्धा की दृष्टि से देखते हैं।


                    इसके अतिरिक्त फरल से ही कुछ तीर्थ और जुडे हैं। जैसे गांव फरल से 2 कि 0 मी 0 के सम्पर्क मार्ग द्वारा पणिश्वर तीर्थ पर पहुंचा जा सकता है। यह तीर्थ पवन पुत्र हनुमान से संबंधित है ; जैसा कि इसके नाम से स्पष्ट भी है।


                        महाभारत में इस नाम से किसी तीर्थ का वर्णन प्राप्त नहीं होता। परन्तु महाभारत के अनुशासन पर्व के दसवें अध्याय में पाणिखात के नाम से एक तीर्थ उल्लेख हैं जिसके   बारे में धारणा है कि वही पाणिखात पणिश्वर है। पाणिखात के विषय में एक स्थान पर वर्णित है -


                       पाणिखातं मिश्रकं मधुवटमनोजवौ।


                                                  ( ब्रह्मा पुराण : 25/42)


                                    इस तीर्थ में स्नान करने के पुण्य के विषय में कहा गया है कि इस तीर्थ में स्नान करने से मनुष्य को एक हजार गाय दान करने के समान फल मिलता है। आगे कहा गया है कि जो मनुष्य पणिश्वर तीर्थ में पितृ - तर्पण करता है वह राजसूर्य यज्ञ के फल का उपयोग करता है। इस पणिश्वर तीर्थ पर वर्तमान में श्री हनुमान जी का भव्य मंदिर है जिसमें बजरंगबली की सुदंर प्रतिमा है। शास्त्रों के अनुसार फल्कीवन में सूर्यकुण्ड तथा बाणेश्वर तीर्थ के नाम के दो और तीर्थ स्थान इस गांव में स्थित हैं। इन दोनों तीर्थों के भी अवशेष मात्र ही शेष हैं। गांव के वृद्धों से प्राप्त जानकारी के अनुसार सूर्य कुण्ड की पौडियां   कांच की बनी थी तथा इस स्थान का बहुत महत्व माना जाता था। आज इसके स्थान पर घास - पत्ते उगे हैं तथा इस ओर किसी का ध्यान नहीं है। इसी प्रकार गांव के उत्तर बाणेश्वर के भी अवशेष मात्र हैं। निःसंकोच कहा जा सकता है कि -


 


                   तीर्थ स्तरन्ति प्रवतो महीरीति ,


                          यज्ञकृतः सुकृतो येन यन्ति।


                                                   अथर्ववेद (18-4-7)


                                                           मनुष्य तीर्थों के सहारे बड़ी से बड़ी विपतियों से तर जाता है। बड़े से बड़े पाप तीर्थ सेवन से समाप्त हो जाते हैं और तीर्थ स्थान करने वाला महान यज्ञ करने वालों के रास्ते से ही स्वर्ग जाता है।