भारत भूमि के अग्रदूत रूप

संस्कृति के प्रथम उद्बोधन ‘ऋग्वेद’ से लेकर सामवेद, यजुर्वेद और अथर्ववेद के मंत्रों के आधार पर; ब्राह्मणग्रंथ, आरण्यक, उपनिषद् और पुराणों के माध्यम से उद्धृत तथा महाभारत व रामायण आदि के आदर्शों से निरंतरता व शुद्धता को धारण करने वाली भारत भूमि; संसार के अग्रदूत के रूप में प्राचीनकाल से प्रसिद्ध है। पृथ्वी 7 द्वीपों में बांट गयी थी। ‘विष्णु पुराण’ के द्वितीयांश के द्वितीय अध्याय में पाराशर जी श्री मैत्रेय मुनि को बताते हैं –

जम्बूप्लक्षाद्धयौ द्वीपौ शाल्मलश्चापरो द्विज।

कुशः क्रौचस्तथा शाकः पुष्करश्चैव सप्तमः।।5।।

जम्बूद्वीपः समस्तानामेतेषां मध्यसंस्थितः।

तस्यापि मेरूमैत्रेय मध्ये कनकपर्वतः।।7।।

अर्थात् यह पृथ्वी सात द्वीपों जम्बूद्वीप, प्लक्षद्वीप, शाल्मलद्वीप, कुशद्वीप, क्रौंचद्वीप, शाकद्वीप और पुष्करद्वीप में बंटी हुई है।।5।। हे मैत्रेय! जम्बूद्वीप इन सब के मध्य में स्थित है। उसके भी मध्य में स्वर्णमय सुमेरू पर्वत है।।7।।

भारत भूमि देवताओं के लिए भी दुर्लभ है तथा देवताओं के द्वारा भी इसकी वंदना की जाती है। हमारी गंगा जैसी पवित्र संस्कृति जिसमें चांद, सूरज, नक्षत्र, नदियां, सागर, पर्वत, सरोवर आदि मात्र प्राकृतिक संसाधन नहीं हैं और मंदिर मात्र आराधना स्थल नहीं हैं बल्कि तीर्थ हैं, जो सदैव प्रेरित करते हैं सतत कर्मशील रहने के लिए; ताकि शास्त्रवर्णित धर्म, अर्थ,काम, मोक्ष ‘‘चतुर्वर्ग’’ की फल प्राप्ति संभव हो सके। इस देवधरा पर कितने तीर्थ हैं इसकी गणना करना संभव नहीं है। किन्तु भारत के प्रसिद्व तीर्थों में जिनका नाम आता है उनमें द्वादश ज्योतिर्ल्लिग, पंचकाशी, पंचनाथ, पंचसरोवर, नौ अरण्यक, चतुर्दश प्रयाग, सप्तक्षेत्र, सप्तगंगा, सप्तपुण्य नदियां सिद्वक्षेत्र (इक्यावन), बावन शक्तिपीठ, पचपन श्राद्ध क्षेत्र, सप्त सरस्वती, सप्तपुरियां,चार धाम आदि जाने कितने ऐसे तीर्थ स्थान हैं। जो अपने महत्व के लिए विश्व प्रसिद्ध हैं।

भारत में हरियाणा के लिएविक्रम संवत 1384 यानि 1327 ईसवी के एक शिलालेख में‘‘ देशोऽस्ति हरियानाख्यः पृथिव्यां स्वर्ग संनिभः। ’’अर्थात् पृथ्वी पर स्वर्ग के समान हरियाणा नामक एक देश है; ऐसा कहा जाता है। हरियाणा स्थित कुरुक्षेत्र का उल्लेख कृष्ण यजुर्वेद की मैत्रायणी शाखा में मिलता है। ऋग्वेद से प्राप्त जानकारी के अनुसार आर्यों की प्रमुख जातियां भरत एवं पुरू भी इसी पावन धरा से जुड़ी रही हैं। जिनके सम्मिश्रण से कुरू नामक जाति का आविर्भाव हुआ। कुरूओं का क्षेत्रयानिकुरूक्षेत्र नामकरण हुआ। कुरुक्षेत्र की गणना सप्तक्षेत्र, बावन शक्तिपीठ, सप्त सरस्वती, सिद्धक्षेत्र (इक्यावन), चार मोक्षदायक साधनों में की जाती है। रामायण में महर्षि बाल्मीकि ने लिखा है-

प्रयागादीनि तीर्थानि गङ्गाद्याः सरितस्तथा ।

नैमिशादीन्यरण्यानि कुरुक्षेत्रादिकान्यपि ।

गतानि तेन लोकेऽस्मिन्येन रामायणं श्रुतम् ।।७.१११.१२।।

कुरूक्षेत्र के संदर्भ में नारद पुराण के उत्तरार्ध के अध्याय 64 में कहा गया है –

सरस्वतीदृषद्वत्योर्देवनद्योर्यदंतरम्।

तं देवसेवितं देशं ब्रह्मावर्तं प्रचक्षते।।६४.६।।

अर्थात् देवनदियों सरस्वती और दृषद्वती के बीच का स्थान जिसका देवता सेवन करते हैं, को ब्रह्मावर्त यानि कुरूक्षेत्र कहा जाता है।

वामन पुराण और महाभारत के अनुसार कुरुक्षेत्र धरा पर सात वन थे और नौ नदियाँ प्रवाहित होती थी।

यह पावन भूमि 48 कोस की आयताकर परिधिमें हरियाणा के कुरूक्षेत्र, कैथल, करनाल, जीन्द एवं पानीपत जिलों में फैली हुई है। इसी धरा पर दृष्द्वती नदी के प्रवाह क्षेत्र में स्थित है फल्कीवन; जो अब फल्गु तीर्थ के नाम से प्रसिद्ध है। फल्कीवन भारत के श्राद्ध के लिए प्रसिद्ध तीर्थों में गया तीर्थ के समान पुण्यदायी है। क्योंकि वामन पुराण में कहा गया है –

काम्यकं च वनं पुण्यं दितिवनं महत्।

व्यासस्य च वनं पुण्यं फलकीवनमेव च ।।

गयायां च यथा श्राद्धं पितृन्प्रीणाति नित्यशः।

तथा श्राद्धं च कर्तव्यं फल्कीवनमाश्रितैः।।४८।।

तीर्थ क्या है

तीर्थ शब्द की उत्पति संस्कृत भाषा के तृ-प्लवनतरणयोःधातु से ‘पातृतुदिवचिरिचिसिचिभ्यस्थक्’  इस उणादि सूत्र से थक्’ प्रत्यय होने पर होती है। ‘तीर्यते अनेन’ अर्थात् इससे तर जाता है; इस अर्थ में तीर्थ’ या अर्धार्चादि से ‘तीर्थः’ शब्द भी बनता है। अमर सिंह ने निपान, आगम, ऋषिजुष्ट जल तथा गुरू की भी तीर्थ संज्ञा बतायी है। यथा-

निपानागमयोस्तीर्थमृषिजुष्टजले गुरौ।।।अमर0 3/थान्त 93 ।।

यानि अमरकोश के टीकाकार निपान में तीर्थ का अर्थ नदी आदि में या जलाशय में किया है तथा आगम का अर्थ शास्त्र किया है। विश्वप्रकाश-कोशकार ने शास्त्र, यज्ञ, क्षेत्र, उपाय, उपाध्याय, मंत्री, अवतार, ऋषिसेवित जल आदि को तीर्थ कहा है –

तीर्थ शास्त्राध्वरक्षेत्रोपायोपाध्यायमन्त्रिषु।

अवतारर्षिजुष्टाम्भः स्त्रीरजःषु च विश्रुतम्। ( थद्विकम्, 8 )

कादम्बरी में बाणभट्ट लिखते हैं –

तीर्थ सर्वविद्यावताराणाम् ।। कादम्बरी 88 ।।

अर्थात् तीर्थ उपचार व साधन भी है।

‘तीर्थ स्तरन्ति प्रवतो महीरीति, यज्ञकृतः सुकृतो येन यन्ति।’ ।।अथर्ववेद (18-4-7)।।

अर्थात् मनुष्य तीर्थों के सहारे बड़ी से बड़ी विपत्तियों से तर जाता है।

‘तीर्थ’ शब्द को परिभाषित करते समय कह सकते हैं –

तीर्थी कुर्वन्ति तीर्थानि।

अर्थात्जो स्थान मन-प्राण-शरीर को निर्मल कर दे, वही तीर्थ है।

श्राद्ध

श्राद्ध परंपरा भारतीय संस्कृति का एक महत्त्वपूर्ण अंग है। यह अपने पूर्वर्जों के प्रति आदर-सम्मान और आस्था का प्रतीक है जिसे बड़ी श्रद्धा से सम्पन्न किया जाता है। इसमें देश के जिन विभिन्न तीर्थों पर पिण्डदान (पितृकर्म) करने की परंपरा है।

‘श्राद्ध’ शब्द की व्युत्पत्ति “श्रद्धा” शब्द से हुई है।

श्राद्ध एवं श्रद्धा में गहरा सम्बन्ध है। ‘श्रद्धा’ शब्द की व्युत्पत्ति ‘श्रत्’ या ‘श्रद्’ शब्द से ‘अङ्’ प्रत्यय की युति होने पर होती है, जिसका अर्थ है- ‘आस्तिक बुद्धि। ‘सत्य धीयते यस्याम्’ अर्थात् जिसमें सत्य प्रतिष्ठित है। जैसा कि छान्दोग्योपनिषद् के अनुसार 7/19 व 20 में श्रद्धा की दो प्रमुख विशेषताएँ बताई गई हैं-मनुष्य के हृदय में निष्ठा/आस्तिक बुद्धि जागृत कराना व मनन कराना।

श्रद्धया इदं श्राद्धम् अर्थात् जो श्रद्धा से किया जाय, वह श्राद्ध है। भावार्थ है पितरों के निमित्त, उनकी आत्मा की तृप्ति के लिए श्रद्धापूर्वक जो अर्पित किया जाए वह श्राद्ध है। श्राद्ध में श्राद्धकर्ता का यह अटल विश्वास होता है कि मृत या पितरों के कल्याण के लिए ब्राह्मणों को जो कुछ भी दिया जाता है वह उसे या उन्हें किसी प्रकार अवश्य ही मिलता है।

पितर और श्राद्ध के बारे में वैदिक साहित्य में विस्तृत उल्लेख मिलता है। चाहे वह ऋग्वेद हो या फिर अथर्ववेद। पितृलोक के लिए भी वेदान्तदर्शन में या षड्दर्शन में स्पष्ट लिखा है कि ‘जो व्यक्ति उपासना करते हैं उन्हें क्रमशः पितृलोक और देवलोक की प्राप्ति होती है।’

स्कन्द पुराण का कथन है कि ‘श्राद्ध’ नाम इसलिए पड़ा है कि क्योंकि इस कार्य में श्रद्धा मूल स्रोत है। इसका तात्पर्य यह है कि इसमें न केवल विश्वास है, अपितु एक अटल धारणा है कि व्यक्ति को यह करना ही है। जैसा कि वायु पुराण के 71वें अध्याय के अनुसार –

‘श्राद्धं चैषां मनुष्यानां श्राद्धमेव प्रवर्तते।17।

अर्थात् मनुष्यों के द्वारा जो श्रद्धा से दिया जाए वही श्राद्ध है।’ इसी संबंध में आगे लिखा है-

‘श्राद्धानि पुष्टिकामाश्च ये करिष्यन्ति मानवाः।

तेभ्यः पुष्टि प्रजाश्चैव दास्यन्ति पितरः सदा।।31।।

अर्थात् जो पितरगण मनुष्यों के द्वारा श्राद्धों से पुष्ट किये जाते हैं; उन्हे पितर हमेशा पुष्टि प्रदान करते हैं।।

भारतीय संस्कृति में माता-पिता को देवताओं के समान माना जाता है और शास्त्रों के अनुसार यदि माता-पिता प्रसन्न होते हैं, तो सभी देवतादि स्वयं ही प्रसन्न हो जाते हैं। ब्रह्मपुराण में तो यहां तक कहा गया है कि श्रद्धापूर्वक श्राद्ध करने वाला मनुष्य अपने पितरों के अलावा ब्रह्मा, रूद्र, अश्विनी कुमार, सूर्य, अग्नि, वायु व मनुष्यगण को भी प्रसन्न करता है। पितृपक्ष में प्रत्येक परिवार में मृत माता-पिता का श्राद्ध किया जाता है। कहा गया है –

‘‘एकैकस्य तिलैर्मिश्रांस्त्र्रींस्त्रीन् दद्याज्जलाज्जलीन्। यावज्जीवकृतं पापं तत्क्षणादेव नश्यति।’’

अर्थात् जो अपने पितरों को तिल-मिश्रित जल की तीन-तीन अंजलियाँ प्रदान करते हैं, उनके जन्म से तर्पण के दिन तक के पापों का नाश हो जाता है। भाद्रपद पूर्णिमा से आश्विन कृष्णपक्ष अमावस्या तक के सोलह दिनों को पितृपक्ष कहते हैं। इस संदर्भ में जिस तिथि को जिस पितर का देहांत हुआ है, उसी तिथि को पितृपक्ष में उनका श्राद्ध किया जाता है। जबकि यदि किसी व्यक्ति की मृत्यु की तिथि ज्ञात न हो तो ऐसे किसी भी मृतक का श्राद्ध अमावस्या को किया जाता है।

पंडित श्री जयगोपाल शर्मा
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