कुरूक्षेत्र

कुरूक्षेत्र वैदिक सभ्यता का उद्भव स्थल एवं भारतीय धर्म, दर्शन, कला और साहित्य की सृजन भूमि रहा है। यहीं पर देवराज इन्द्र ने वृत्रासुर का नाश करने के लिए महर्षि दधीचि से अस्थि-दान प्राप्त किया था। नारदपुराणमुत्तरार्ध में कुरूक्षेत्र के लिए वर्णित है –

दूरस्थोऽपि कुरुक्षेत्रे गच्छामि च वसाम्यहम्।

एवं यः सतत ब्रूयात्सोऽपि पापैः प्रमुच्यते।।६४.७।।

तत्र वै यो वसेद्धीरः सरस्वत्यास्तटे स्थितः।

तस्य ज्ञानं ब्रह्ममयं भविष्यति न संशयः।।६४.८।।

अर्थात् ‘‘जो दूर से भी कुरूक्षेत्र जाऊँगा या रहूँगा, ऐसा हमेशा कहता है; वह पापों से मुक्त हो जाता है। जो निश्चय से ही सरस्वती के तट पर स्थित रहकर वास करता है उसका ब्रह्म ज्ञान ब्रह्ममय हो जायेगा अथवा उसे ब्रह्म ज्ञान की प्राप्ति हो जायेगी, इसमें कोई संशय नहीं है।’’ इसी संबंध में आगे लिखा है –

देवता ऋषयः सिद्धाः सेवन्ते कुरुजांगलम् ।।

तस्य संसेवनाद्देवि ब्रह्म चात्मनि पश्यति ।। ६४-९ ।।

अर्थात् देवता, सिद्ध और ऋषि कुरूक्षेत्र का सेवन करते हैं। उसके सेवन से मनुष्य ब्रह्म और आत्मा को देखता है। भावार्थ है कि ब्रह्मज्ञान और आत्मज्ञान प्राप्त कर लेता है।

महाभारत के वन पर्व के ८३.५में कहा गया है –

“ततोगच्छेतधर्मज्ञ ! ब्रह्मावर्तंनराधिप !   ब्रह्मावर्ते नरः स्नात्वा ब्रह्मलोकमवाप्नुयात्।।”

‘‘समन्तपंचक नाम का उत्तम धर्मस्थान सब ओर पांच-पांच योजन तक फैला हुआ है। ’’  योजन नामक परिमाप के दृष्टिगत आधुनिक काल में 48 कोस क्षेत्र में कुरूक्षेत्र का विस्तार माना जाता है। नारद पुराण के अनुसार –

पंचयोजनविस्तारं दयासत्यक्षमोद्गमम् ।।

समंतपंचकं तावत्कुरुक्षेत्रमुदाहृतम् ।। ६४-२० ।।

इसके भौगोलिक रूप को देखने पर पता चलता है कि यह क्षेत्र सरस्वती, दृषद्वती, आपगा से परिबद्ध था। जिसके दक्षिण में खाण्ड व प्रस्थ अर्थात् इंद्रप्रस्थ, पश्चिम भाग में मरूभूमि है। सरस्वती और दृषद्वती के मध्य की भूमि कुरूक्षेत्र कहलाती थी। जिसके चारों कोनों में चार यक्ष (द्वारपाल) प्रतिष्ठित थे। आरम्भिक में कुरुक्षेत्र ब्रह्मा की यज्ञ-वेदी कहा जाता था, जिसका विस्तार पांच-पांच योजन तक बताया गया है उसे ही समन्तपञ्चक कहा गया है। जिसका अभिप्राय होता है 20 योजन का चक्र। तदनुसार कुरुक्षेत्र 48 में फैला माना जाता है। भारतवर्ष में कुरूक्षेत्र की 48 कोस की यह परिधि आयताकार रूप में हरियाणा के कुरूक्षेत्र, कैथल, करनाल, जीन्द एवं पानीपत जिलों में फैली हुई है।

वामन पुराण और महाभारतानुसार उत्तर-पूर्व में रंतुक यक्ष (बीड़ पीपली के पास) पश्चिम में अरंतुक यक्ष (कैथल में बेहर गांव के पास) दक्षिण-पश्चिम में रामहृद यक्ष (जिला जीन्द में रामराय के पास) एवं दक्षिण पूर्व में मचक्रुक यक्ष (जिला पानीपत में सींख के पास) का स्पष्ट वर्णन मिलता है। इस प्रकार इन चार यक्षों द्वारा रक्षित इस आयताकार 48 कोस की भूमि में 360 तीर्थों की उपस्थिति मानी जाती है। ये सभी तीर्थ पौराणिक दृष्टि से सत्युग, त्रेतायुग, द्वापर युग एवं ऐतिहासिक दृष्टि से महाभारत के पूर्ववर्ती व परवर्ती काल से संबंधित हैं। कुरूक्षेत्र की इस 48 कोस की पावन धारा पर स्थित हर गांव का संबंध किसी न किसी रूप में संस्कृति या सभ्यता से जुड़ा है।

राजा कुरू से कुरूक्षेत्र होने के साथ-साथ धर्मक्षेत्र होने की कहानी भी रोचक है। वामन पुराण के अनुसारसत्युग के प्रारंभ में सोमवंश में ऋक्ष नाम के महाबलशाली राजा हुए। जिनके यहां संवरण नामक पुत्र की उत्पति हुई । राजा संवरण ने सूर्य की पुत्री तपती के साथ विवाह किया। तदनन्तर तपती के गर्भ से एक पुत्र‘कुरू’ राजा संवरण को प्राप्त हुआ। कुरू का विवाह राजा सुदामा की पुत्री सौदामिनी से हुआ। कुरू यश को ही श्रेष्ठ समझते थे। कुरू यहां-वहां यश प्राप्ति का मार्ग खोजने लगे। राजा कुरू ने द्वैतवन में महापवित्र सरस्वती को देखा। जिसके तट पर करोड़ों तीर्थ हैं। राजा ने वहां स्नान किया और प्रजापति ब्रह्म की उत्तरवेदी समंतपंचक पर गए। वहां उन राजर्षि कुरू ने सोचा कि इस समन्तपंचक क्षेत्र को महाफलदायी बनाऊँगा और यहीं सभी कामनाओं हेतु कृषि करूंगा। जैसा कि वामन पुराण(२२.२१) में लिखा है –

तममन्यत राजर्षिरिदं क्षेत्रं महाफलम्।

करिष्यामि कृषिष्यामि सर्वान् कामान् यथेप्सितान्।।

फिर राजा ने सोने का हल बनवाकर शंकर के बैल और यमराज के भैंसे को बांधकर जब जुताई करने को तैयार हुए तो देवराज इन्द्र वहां पहुंचे और बोले, राजन ! क्या कर रहे हो ? राजा प्रत्युतर में बोले कि मैं अष्टांग(तप, सत्य, क्षमा, दया,शौच, दान, योग और ब्रह्मचर्य) की खेती कर रहा हूं। इस पर इन्द्र बोले,‘‘बीज कहां हैं?’’ इस प्रकार उपहास करने लगे। इसके बाद भी कुरू प्रतिदिन सात-सात कोस धरती जोतते रहे। फिर भगवान विष्णु वहां कुरू के पास गए और उन्हें उक्त प्रश्न पूछे। इस पर कुरू ने उन्हें अष्टांग (तप, सत्य, क्षमा, दया, शौच, दान, योग और ब्रह्मचर्य) की खेती करने के अपने इरादे से अवगत कराया और जब भगवान ने उनसे बीज के बारे में पूछा तो उन्होंने अपने शरीरांगों को बीज बताया। इसके बाद भगवान विष्णु बोले,‘‘ हे कुरू! तुम हल जोतो मैं तुम्हारे शरीर के अंगों को बोता हूं।’’ इस प्रकार एक-एक करके राजा कुरू अपने शरीर के अंगों को भगवान को देते रहे और वे बोते रहे । अंत में जब राजा कुरू ने अपना मस्तक बोने के लिए दिया भगवान राजा पर प्रसन्न हो गए और बोले राजन् वर मांगों। जिस पर कुरू ने भगवान विष्णु से विनम्र प्रार्थना करते कहा,‘‘हे प्रभु! जिस स्थान को मैने जोता है, वह धर्मक्षेत्र हो जाए। यहां स्नान करने वालों और मरने वालों को महापुण्य की प्राप्ति हो। यहां किये जाने वाले उपवास, स्नान, जप, हवन, दान, यज्ञ आदि कर्म अक्षय एवं महान फल देने वाले हों तथा आप सभी देवों के साथ यहां निवास करें। ’’ यथा –

यावदेतन्मया कृष्टं धर्मक्षेत्रं तदस्तु च।

स्नातानां च मृतानां च महापुण्यफलं त्विह।।वा.पु.२२.३३।।

महाराज कुरू ने 48 कोस कुरूक्षेत्र भूमि पर सोने का हल चलाया तथा धर्म का बीज बोया। इस संबंध में विभिन्न कथाएं, प्रसंग एवं आख्यान प्रचलित हैं तथा उनका विशद विवरण भी प्राप्त होता है। यहां स्थित श्रयणावत सरोवर के पास इंद्र को महर्षि दधीचि से अस्थियों की प्राप्ति, पुरूरवा और उर्वशी का पुनर्मिलन, परशुराम द्वारा आततायी क्षत्रियों के खून से पांच कुण्ड भरने का वर्णन, वामन अवतार जैसे कई आख्यान लोक प्रचलित हैं और पुराणों में प्राप्त भी होते हैं। कुरूक्षेत्र के बारे में वामन पुराण में लिखा है कुरूक्षेत्र की पवित्र भूमि प्राचीन काल में घने वनों से आच्छादित थी। वामन पुराण में कुरूक्षेत्र भूमि में स्थित सात वनों एवं नौ नदियों का स्पष्ट नामोल्लेख मिलता है। वामन पुराण के अनुसार –

श्रृणु सप्त वनानीह कुरूक्षेत्रस्य मध्यतः।

येषां नामानि पुण्यानि सर्वपापहराणि च।।

काम्यकं च वनं पुण्यं दितिवनं महत्।

व्यासस्य च वनं पुण्यं फलकीवनमेव च ।।

तथा सूर्यवनस्थानं तथा मधुवनं महत्।

पुण्यं शीतवनं नाम सर्वकल्मषनाशनम् ।।

(वामन पुराण-34/3-5)

अर्थात् ‘‘कुरूक्षेत्र के मध्य में स्थित सात वनों के बारे में सुनो, जिन पुण्यशाली वनों के नाम का उच्चारण करते ही मनुष्य के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। यहां पुण्यदायक काम्यक वन, महान अदिति वन और व्यास वन व पुण्यशाली फलकीवन है , उसी प्रकार सूर्यवन और महान मधुवन तथा सभी प्रकार के क्लेशों को नष्ट करने वाला शीतवन स्थित है। ’’ नौ नदियों के बारे में लिखा गया है –

वनान्येतानि वै सप्त नदीः श्रृणुत मे द्विजाः।

सरस्वती नदी पुण्या तथा वैतरणी नदी।।

आपगा च महापुण्या गंगा मंदाकिनी नदी।

मधुस्रवा वासुनदी कौषिकी पापनाशिनी।।

दृषद्वती महापुण्या तथा हिरण्यवती।

वर्षाकालवहाः सर्वां वर्जयित्वा सरस्वतीम्।।(वा.पु.-३४.६-८)

अर्थात् ‘‘इन सात वनों के बाद अब मुझसे नदियों के नाम सुनो, पुण्यशाली सरस्वती नदी, वैतरणी, महानपुण्यप्रदा आपगा, मंदाकिनी गंगा, मधुस्रवा, वासुनदी और पापनाशिनी कौशिकी तथा महापुण्या दृषद्वती व हिरण्यवती हैं। सरस्वती के अतिरिक्त शेष सभी नदियां वर्षाकाल में ही बहती हैं। ’’

लोक कवि ‘साधुराम’ की रचना के अनुसार कुरुक्षेत्र 9 नदियां 366 तीर्थ, 4 यक्ष, 33 कोटि देवी-देवता, नाथ तथा 84 सिद्धों का निवास है। कुरूक्षेत्र के तीर्थों में ब्रह्मसरोवर, सन्निहित सरोवर, ज्योतिसर, पेहवा का पृथूदक् तीर्थ, स्थानेश्वर महादेव मंदिर, भद्रकाली मंदिर,फरल (फलकीवन) स्थित फल्गु व पणिश्वर तीर्थ,रामहृद तीर्थ, सालवन तीर्थ, कपिलमुनि तीर्थ, आपगा तीर्थ, बस्थली का व्यास स्थली तीर्थ, वृद्धकेदार तीर्थ, ग्यारह रूद्री मंदिर, बाबा राजपुरी, श्रृंगी ऋषि स्थल, मार्कण्डेय ऋषि स्थल, शुकदेव मुनि का स्थल, अरन्तुक यक्ष स्थल, कामेश्वर महादेव, पूण्डरीक तीर्थ, कपिलमुनि की तपस्थली कौल, ऋषि जमदग्नि स्थल जाजनपुर आदिपौराणिकवधार्मिक दृष्टि सेविशेष महत्त्व रखते हैं।

पंडित श्री जयगोपाल शर्मा
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